आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी (Unemployment) को छुपाना ग़लत

मोदी सरकार जिस डेटा का बखान कर रही है, वह सालाना आधार पर देश में रोजगार परिदृश्यों की सामान्य स्थिति का डेटा है।

आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी (Unemployment) को छुपाना ग़लत

साभार : न्यूज़क्लिक 

डॉ॰ ज्ञान पाठक लिखते हैं कि हमें पीएलएफएस डेटा द्वारा दर्शाए गई 'सामान्य स्थिति' पर भरोसा नहीं करना चाहिए। बल्कि बेरोजगारों के दुखों और तकलीफ़ों को कम करने के लिए धरातल पर मौजूद 'वर्तमान स्थिति' पर विचार करना चाहिए, जो बहुत संकटग्रस्त है और इस संकट के चलते कई बेरोज़गार आत्महत्या भी कर रहे हैं। 

हाल ही में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) देश को यह बताने की कोशिश कर रहा है कि श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) और बेरोजगारी दर दोनों में पिछले तीन वर्षों से सुधार हो रहा था।

ऐसा नतीजा सरकार ने स्पष्ट रूप से जमीन पर बिगड़ती वास्तविकता पर विचार किए बिना राजनीतिक पैंतरेबाजी का सहारा लेकर निकाला है, जबकि उन आंकड़ों को समझे बिना जो छुपाते कम और दिखाते ज्यादा हैं। 

देश जिस बेरोजगारी के संकट से जूझ रहा है, उसे छिपाने के लेई इस तरह के डेटा के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

हमें अपनी प्राथमिकताओं को रास्ते पर लाने के लिए किसी भी योग्य निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आलोचकों और सरकार दोनों को समझना होगा। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 में देश में श्रम भागीदारी 36.9 फीसदी और बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी थी। 

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यह याद रखना चाहिए कि उस वर्ष की रिपोर्ट ने देश में बहुत बड़ा विवाद पैदा कर दिया था क्योंकि सरकार ने इसे  दबाने की कोशिश की थी,और पैनल के सदस्यों में से एक ने विरोध में इस्तीफा भी दे दिया था।

लीक हुई रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है, जिसे सरकार ने नकार दिया क्योंकि रिपोर्ट लोकसभा चुनाव-2019 से ठीक पहले आई थी। हालांकि, चुनाव खत्म होने के बाद, सरकार ने इन आंकड़ों को स्वीकार कर लिया था। इसलिए, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बेरोजगारी दर तभी से बिगड़ती जा रही थी।

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आकलन की एक नई प्रणाली अपनाने के बाद यह पहली रिपोर्ट आई थी। सरकार ने तब एनएसएसओ में कुछ ढांचागत बदलाव किए थे। तब से एनएसओ सर्वे कर रहा है। 2018-19 के सर्वेक्षण में एलएफपीआर में 37.5 प्रतिशत का सुधार दिखाया गया है, जो 2019-20 में बढ़कर 40.1 प्रतिशत हो गया था। 

इस अवधि के दौरान रिपोर्ट बेरोजगारी की दर में भी सुधार दिखाती है जो 2018-19 में 6.1 प्रतिशत से गिरकर 5.8 प्रतिशत और 2019-20 में 4.8 प्रतिशत हो गई थी।

आलोचक हमें कुछ अलग ही बात बताते रहे हैं। उनका कहना है कि देश में महामारी के आने के पहले से ही बेरोजगारी बढ़ रही थी, जिसने एलएफपीआर और बेरोजगारी दर को और खराब कर दिया। 

वे सवाल उठाते हैं कि जब देश की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक गिरावट के दौर से गुजर रही थी, तब बेरोजगारी दर में सुधार कैसे हो सकता है, जबकि 2019-20 में विकास दर भी घटकर केवल 4.2 प्रतिशत रह गई थी?

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इस प्रकार आलोचकों के भीतर डेटा, इसके संग्रह के तरीके और वार्षिक आधार पर विश्लेषण को लेकर संदेह हो गया है।

मोदी सरकार जो डेटा उद्धृत कर रही है, वह सालाना आधार पर देश में रोजगार परिदृश्यों की सामान्य स्थिति है। अब तस्वीर को स्पष्ट करने के लिए पीएलएफएस डेटा में गहराई से उतरना होगा। 

वर्तमान स्थिति काफी अलग है जिसके लिए आंकड़े साप्ताहिक आधार पर इकट्ठे किए जाते हैं और उनका विश्लेषण किया जाता है। जुलाई-सितंबर 2019 के दौरान, एलएफपीआर 36.8 प्रतिशत था, जो अगली दो तिमाहियों में थोड़ा सुधरकर 37.2 और 37.5 हो गया था, लेकिन अप्रैल-जून 2020 की अंतिम तिमाही में तेजी से गिरकर 35.9 प्रतिशत पर आ गया था, जो पहली तिमाही से भी कम 0.9 प्रतिशत था। 

इन तिमाहियों के दौरान बेरोजगारी दर क्रमशः 8.4, 7.9, 9.1 और 20.9 प्रतिशत हो गई थी, जो बेरोजगारी की स्थिति में गिरावट को दर्शाता है। सर्वेक्षण के तहत पाया गया कि वर्ष की सभी चार तिमाहियों में, 15-19 वर्ष की बीच के युवाओं के भीतर बेरोजगारी की दर कहीं अधिक खराब थी जो क्रमशः 20.6, 19.2, 21.1 और 34.7 प्रतिशत थी।

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जब देश में महामारी फैली थी या फैल रही थी, तब जमीन पर यही वास्तविक स्थिति थी। यही 'वर्तमान स्थिति' थी जिसे 'सामान्य स्थिति' बता कर सरकार उद्धृत कर रही है और सच्चाई को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही है।

यहाँ तक कि पीएलएफएस सर्वेक्षण में भी बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति और श्रम बल की भागीदारी दर अचानक खराब हो गई नज़र आती है। 24 मार्च, 2020 को देश में लॉककडाउन किया गया था, और तब जनवरी-मार्च 2020 के दौरान, एलएफपीआर दर 37.5 थी और  बेरोजगारी दर 9.1 थी, और युवा के भीतर बेरोजगारी दर 21.1 प्रतिशत थी। जब हम केवल 'सामान्य स्थिति' के आंकड़ों को देखते हैं तो यह जमीनी हकीकत की 'वर्तमान स्थिति' को छुपा देती है।

'वर्तमान स्थिति' के आंकड़ों से पता चलता है कि मई 2020 में भारत की बेरोजगारी दर 23.5 प्रतिशत थी। इसके बाद, जनवरी 2021 तक महीने के आधार पर इसमें उतार-चढ़ाव होता रहा। इसका मतलब है कि एक महीने में लोगों को रोजगार मिल रहा था और अगले महीने वे रोजगार से हाथ धो रहे थे। 

2021 की शुरुआत से ही यह स्थिति और खराब हो गई थी। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में बेरोजगारी दर 6.52 फीसदी थी जो अप्रैल में बढ़कर 7.97 फीसद और 9 मई को 8.2 फीसदी हो गई थी। मई 2021 में बेरोजगारी दर 11.9 फीसदी, जून में 9.17 फीसदी और 23 जुलाई में 7.26 फीसदी थी। 

23 जुलाई को ग्रामीण बेरोजगारी 6.74 प्रतिशत के मुकाबले शहरी बेरोजगारी 8.39 प्रतिशत अधिक थी।

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श्रम बल भागीदारी दर के अनुसार और सीएमआईई द्वारा मूल्यांकन की गई वर्तमान स्थिति के अनुसार, अक्टूबर 2019 में यह दर 42.9 प्रतिशत थी, जिसमें अप्रैल 2020 में 7.08 प्रतिशत की गिरावट आई थी। अक्टूबर 2020 में यह 40.66 प्रतिशत थी, और अप्रैल 2021 में 36.79 प्रतिशत थी, जो जनवरी 2021 से चार महीने कम पर थी।

हमने अप्रैल में 7.35 मिलियन नौकरियां खो दी थीं और नौकरियों में केवल 390 मिलियन लोग रह गए थे यानी जरूरत का केवल एक तिहाई। अप्रैल-मई 2021 में नौकरियों का कुल नुकसान 22.7 मिलियन था। 27 जून, 2021 को समाप्त हुए सप्ताह में एलएफपीआर दर 39.6 प्रतिशत थी, जो सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार 2019-20 के 42.7 प्रतिशत के औसत एलएफपीआर से काफी कम थी। 

निश्चित तौर पर यह चिंताजनक मसला है कि जुलाई 2020 और मार्च 2021 के बीच रोजगार दर 38 प्रतिशत के करीब थी, जो अप्रैल में गिरकर 36.8 प्रतिशत और मई 2021 में 35.3 प्रतिशत रह गई थी। 

जून 2021 में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और यह बढ़कर 36 प्रतिशत हो गई थी। इस प्रकार जमीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज करना बहुत चिंताजनक मसला है। हमें पीएलएफएस डेटा की 'सामान्य स्थिति' पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि बेरोजगारों के दुखों को कम करने के लिए जमीन पर मौजूद 'वर्तमान स्थिति' पर विचार करना चाहिए, जो बहुत संकटग्रस्त हैं और जिसके चलते कई बेरोज़गार आत्महत्याएं भी कर रहे हैं। 


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